पंजाब में फरवरी 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले मतदाताओं के बीच अभी भी स्पष्ट राजनीतिक ध्रुवीकरण दिखाई नहीं देता। विभिन्न दल अलग-अलग मुद्दों के सहारे अपनी चुनावी जमीन मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं। भारतीय जनता पार्टी नशे और कानून-व्यवस्था को प्रमुख मुद्दा बना रही है। शिरोमणि अकाली दल सिख पंथ की पहचान और गौरव के सवाल पर अपनी राजनीति केंद्रित कर रहा है। आम आदमी पार्टी अपनी कल्याणकारी योजनाओं की निरंतरता को चुनावी संदेश का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाए हुए है। और, कांग्रेस अभी तक अपने आंतरिक अंतर्विरोधों की छाया से पूरी तरह बाहर निकलती दिखाई नहीं देती।
सचिन पायलट को पंजाब की जिम्मेदारी मिलने के बाद कांग्रेस की संगठनात्मक दिशा को लेकर उत्सुकता तो बढ़ी है, लेकिन उसका कोई स्पष्ट राजनीतिक संदेश अभी तक व्यापक स्तर पर धरातल पर उतरता दिखाई नहीं देता। हाईकमान के निर्णय को पार्टी के विभिन्न गुटों ने अपेक्षाकृत सकारात्मक ढंग से स्वीकार किया है। इसके बावजूद राहुल गांधी जिस प्रकार युवाओं और छात्रों के बीच राजनीतिक संवाद स्थापित करने का प्रयास कर रहे हैं, वैसी ऊर्जा अभी पंजाब कांग्रेस के संगठन में स्पष्ट रूप से दिखाई नहीं देती।
सांसदों के इर्द-गिर्द सिमटी संगठनात्मक संरचना
पंजाब कांग्रेस की वर्तमान संरचना में सांसदों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण दिखाई देती है। सांसद ही अभी तक प्रदेश की राजनीति और रणनीति की डोर अपने हाथों में रखे हुए हैं। प्रदेश अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग लुधियाना से सांसद हैं। पूर्व मुख्यमंत्री और जालंधर से सांसद चरणजीत सिंह चन्नी चुनाव प्रचार समिति के अध्यक्ष हैं, जबकि गुरदासपुर से सांसद सुखजिंदर सिंह रंधावा को चुनावों के लिए गठित कोर कमेटी का अध्यक्ष बनाया गया है।
घोषणापत्र समिति की कमान फतेहगढ़ साहिब से सांसद डॉ. अमर सिंह के हाथ में है और अमृतसर के सांसद गुरजीत सिंह औजला उसके सह-अध्यक्ष हैं। पटियाला से सांसद डॉ. धर्मवीर गांधी और फिरोजपुर से सांसद शेर सिंह घुबाया भी विभिन्न समितियों में शामिल हैं।
1 जुलाई को गठित इन समितियों का उद्देश्य चुनावी तैयारी को संगठित करना था, लेकिन अब तक उनके कामकाज का ऐसा व्यापक प्रभाव दिखाई नहीं दिया है जिसने कार्यकर्ताओं में बड़े पैमाने पर उत्साह पैदा किया हो।
बड़े प्रादेशिक नेता चेहरे पृष्ठभूमि में
कांग्रेस के कई प्रमुख विधानसभा चेहरे फिलहाल अपेक्षाकृत पृष्ठभूमि में नजर आते हैं। नेता प्रतिपक्ष प्रताप सिंह बाजवा, विजय इंदर सिंगला, ब्रह्म महिंद्रा, राणा गुरजीत सिंह, कुलजीत सिंह नागरा, प्रगट सिंह, बरिंदरमीत सिंह पहाड़ा और सुखपाल सिंह खैरा जैसे नेताओं को विभिन्न समितियों में स्थान तो मिला है, लेकिन उनकी सार्वजनिक राजनीतिक सक्रियता अभी संगठन की केंद्रीय रणनीति के रूप में उभरती दिखाई नहीं देती।
यही वह बिंदु है जिस पर राजनीतिक विश्लेषकों की नजर सबसे अधिक है। 1 जुलाई को निर्मित इस कमेटियों के कार्यों की हलचल पंजाब के कांग्रेस कार्यकर्ताओं में उत्साह कायम करने में अभी सक्रियता से जुटी हो ऐसा कोई संदेश कांग्रेस ने स्थापित नहीं किया है।
क्या सांसदों पर अत्यधिक निर्भरता जोखिम बन सकती है?
कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि प्रदेश स्तर की चुनावी तैयारी में सांसदों की प्रमुख भूमिका मतदाताओं के बीच नेतृत्व को लेकर स्पष्टता बनने की प्रक्रिया को धीमा कर सकती है। साथ ही यह अटकलें भी लगाई जा रही हैं कि कांग्रेस अपने सांसदों को विधानसभा चुनाव में उम्मीदवार बनाने से बचना चाह सकती है, ताकि लोकसभा में उसकी संख्या बनी रहे। हालांकि इस संबंध में पार्टी की ओर से कोई औपचारिक घोषणा नहीं की गई है।
इस चर्चा की पृष्ठभूमि में विपक्ष की संसदीय भूमिका भी आती है। कांग्रेस लगातार महिला आरक्षण के कार्यान्वयन, परिसीमन और “एक राष्ट्र, एक चुनाव” जैसे प्रस्तावों पर अपनी राजनीतिक आपत्तियाँ दर्ज करती रही है। ऐसे में संसद में प्रत्येक सांसद की भूमिका को लेकर पार्टी के भीतर रणनीतिक विचार-विमर्श की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
सचिन पायलट के सामने असली परीक्षा
अब सबकी निगाहें सचिन पायलट पर टिकी हुयी हैं कि वो किस तरह कांग्रेस की चुनौती को संतुलन में ला कर प्रदेश को चुनावों में नयी दिशा देते हैं। सचिन पायलट को पार्टी की एकजुटता बनाये रखते हुए पंजाब के लिए नए विश्वास को मतदाता तक मजबूत करना है।
कमजोर क्षेत्रों में कार्यकर्ताओं और समर्थकों के बीच नई प्रतिबद्धता पैदा करना कांग्रेस की प्राथमिक आवश्यकता होगी। इसके साथ-साथ पार्टी को तीन मोर्चों पर भरोसा कायम करना होगा—
- संगठन में अनुशासन,
- स्पष्ट कार्ययोजना,
- और उम्मीदवार चयन की विश्वसनीय एवं निष्पक्ष प्रक्रिया।
सिर्फ विरोधी दलों की आलोचना कांग्रेस के लिए पर्याप्त रणनीति साबित नहीं होगी। मतदाता अब ठोस समाधान और विश्वसनीय नेतृत्व दोनों देखना चाहता है।
बहुकोणीय मुकाबले की चुनौती
वर्तमान सत्ताधारी आम आदमी पार्टी रणनीतिक तौर पर भाजपा और शिरोमणि अकाली दल को अपना प्रतिद्वंदी मान कर हमलावर है। कांग्रेस को मुख्य प्रतिद्वंदी के तौर पर खुद को खड़ा करने के लिए कड़ी मशक्क्त करनी है। कांग्रेस अभी तक मतदाताओं की प्राथमिकता में अपना स्थान मुख्य प्रतिद्वंद्वी के रूप में बनाने में चूक रही है।
चुनावों में अबकी बहुकोणीय मकाबले के अनुरूप ही रणनीति तय करने की चुनौती भी कांग्रेस के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं। भारतीय जनता पार्टी ने सभी 117 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने के अपने संकल्प को बार-बार दोहराया है। पंजाब के माझा और दोआबा क्षेत्र में कांग्रेस की स्थिति 2024 के लोक सभा चुनावों में अपेक्षाकृत बेहतर रही थी लेकिन 69 सीटों वाले मालवा क्षेत्र में कांग्रेस को अपनी राजनितिक जमीन को उल्लेखनीय रूप मजबूत करना ही उसे सत्ता के करीब ले जा सकता है। क्योंकि राज्य की चुनावी दिशा काफी हद तक इसी क्षेत्र से तय होती है।
पंजाब का मतदाता फिलहाल एक संतुलित और स्थिर राजनीतिक विकल्प की तलाश में दिखाई देता है। कांग्रेस के सामने चुनौती केवल सत्ता विरोधी माहौल का लाभ उठाने की नहीं, बल्कि यह साबित करने की है कि वह संगठनात्मक एकजुटता, स्पष्ट नेतृत्व और भरोसेमंद कार्यक्रम के साथ प्रदेश को एक व्यवहारिक विकल्प दे सकती है।
फरवरी 2027 के चुनाव से पहले सबसे बड़ा सवाल यही रहेगा कि क्या कांग्रेस अपने भीतर की ऊर्जा को चुनावी ताकत में बदल पाएगी, या बहुकोणीय मुकाबले में उसकी सबसे बड़ी चुनौती उसका अपना संगठन ही बना रहेगा।
(जगदीप सिंह सिंधु वरिष्ठ पत्रकार हैं।)